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Thursday, May 4, 2023

क्या आप जानते हैं भगवद गीता के अनुसार शरीर क्या है ?






भगवद गीता हमें जीवन के विभिन्न पहलुओं पर विचार करने के लिए उत्तेजित करती है। इस ग्रंथ में जीवन के अनेक महत्वपूर्ण विषय हैं, जिनमें शरीर की भूमिका भी शामिल है। शरीर के सम्बन्ध में गीता की शिक्षाएं अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।

भगवद गीता में शरीर को एक आवास के समान बताया गया है। जैसे कि जीव को आवास की आवश्यकता होती है वैसे ही शरीर भी जीव को उसके धर्मपरायण जीवन को निर्वाह करने के लिए आवश्यक होता है। गीता में शरीर को नश्वर बताया गया है, जो अर्थात जो नश्वर होता है, वह कभी अमर नहीं होता है। इसलिए, शरीर को स्थायी माना नहीं जाता है।भगवद गीता में शरीर के अलावा जीव और परमात्मा के बीच भी एक संबंध बताया गया है। गीता के अनुसार, शरीर जीव का एक मात्र आवास होता है और जीव परमात्मा का ही अंश होता है। इसलिए, शरीर के सम्बन्ध में ज्ञान का उपदेश दिया जाता है कि शरीर को धार्मिक नियमों और संस्कृति के अनुसार नियंत्रित किया जाना चाहिए, ताकि जीव अपने जीवन के उद्देश्य को पूरा कर सके। गीता में शरीर के साथ-साथ उसकी देखभाल और संरक्षण का भी जिक्र है। शरीर को उचित भोजन, आहार, विश्राम और व्यायाम की आवश्यकता होती है। इसलिए, गीता शरीर की सुव्यवस्थित देखभाल को महत्वपूर्ण बताती है।

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