"धर्म" विश्वभर में सभी धार्मिक और आध्यात्मिक प्रथाओं का मूल और महत्वपूर्ण सिद्धांत है। इसीलिए भारतीय साहित्य के महाग्रंथ भगवद गीता में धर्म के महत्वपूर्ण अध्याय हैं जो हमें धर्म के सामान्य और आध्यात्मिक अर्थ को समझाते हैं।
धर्म का मतलब भगवद गीता में व्याख्यात किया गया है और यह एक व्यापक और गहन मान्यता है। धर्म को अलग-अलग संस्कृति और धर्म तत्वों के संगठित समूह के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए बल्कि इसे मनुष्य के आत्मा के साथ जुड़े संबंध के रूप में समझना चाहिए।
धर्म का अर्थ भगवद गीता में व्यक्त किया गया है उसे प्राकृतिक संकल्प और दिव्य संकल्प के रूप में बांटा गया है। प्राकृतिक संकल्प धर्म अपनी स्वभाविक रूप से जीवन के नियमों को अनुसरण करने और कर्मों के द्वारा समृद्धि, धर्म और सुख की प्राप्ति का प्रयास करता है। यह मनुष्य के अभाव, अज्ञान और अहंकार के कारण प्रभावित हो सकता है।
